- भारत वह देश है जो भविष्य में एआई की दिशा और दशा तय करेगा- माननीय मंत्री श्री जितिन प्रसाद
- एआई केवल एक तकनीकी आयाम है, संवेदना और करुणा का अंग नहीं- प्रो. नारायणलाल गुप्ता
नई दिल्ली, राष्ट्रीय शैक्षिक संघ, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) एवं दीनदयाल उपाध्याय महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 22-23 फरवरी 2026 को 'डिजिटल समाज और मानव मूल्य: एआई युग मेंएकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता' विषय पर दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन शुभाआरंभ डॉ. भीमराव अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में हुआ। इस कार्यक्रम का लक्ष्य आज के सूचनाक्रांति और एआई के युग में मानवीय मूल्यों की प्रासंगिकता को लक्षित करना है।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि माननीय श्री जितिन प्रसाद, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार, विशिष्ट अतिथि प्रो. अशोक किमर चक्रवाल, कुलपति, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, सत्राध्यक्ष प्रो. नारायणलाल गुप्ता, अध्यक्ष; एबीआरएसएम, इसके अतिरिक्त प्रो. हेमचन्द्र जैन, प्राचार्य, दीनदयाल उपाध्याय महाविद्यालय; दिल्ली विश्वविद्यालय, एबीआरएसएम के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीमान महेंद्र कपूर, सह-संगठन मंत्री श्री गुंथा लक्ष्मण तथा सचिव प्रो. गीता भट्ट, प्रो. वीरेंद्र भारद्वाज, प्राचार्य, शिवाजी महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय सहित अन्य गणमान्य अतिथियों की विशिष्ट उपस्थिती रही।
प्रो. हेमचन्द्र जैन ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए एआई के चुनौतीपूर्ण समय में मानवीय मूल्यों की महत्ता के संदर्भ में इस संगोष्ठी को निर्णायक कदम बताया। प्रो. अशोक कुमार चक्रवाल ने ज़ोर देते हुए कहा कि एआई न तो हमारा गुरु हो सकता है और न ही हमें अपना शिष्य बना सकता है। एआई का हमें एक दास की तरह सहायक टूल के तौर पर उपयोग करते हुए निरंतर बेहतर होना है।
हाल ही में संपन्न हुए एआई समिट (AI Summit)—जिसे दुनिया भर के एआई सम्मेलनों की जननी कहा जा रहा है—में 86 देशों ने एक बड़े समझौते पर मुहर लगाई है कि भविष्य की तकनीक समावेशी और मानवीय मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। यह बात केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने आज राजधानी में आयोजित एक दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि यह वैश्विक समझौता इस बात का सबूत है कि भारत अब एआई के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने जा रहा है, जो 2047 से बहुत पहले ही 'विकसित भारत' के सपने को पूरा करने में मदद करेगा। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री प्रसाद ने साफ तौर पर कहा कि भारत सरकार का मानना है कि एआई केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति के लिए है। उन्होंने डिजिटल साक्षरता को जन-जन तक पहुँचाने पर जोर दिया, ताकि आम आदमी भी इस तकनीक का लाभ उठा सके। हालांकि, उन्होंने डीपफेक और एआई से फैलने वाली भ्रामक जानकारियों के प्रति सावधान रहने की चेतावनी भी दी।
प्रो. नारायणलाल गुप्ता ने अपने वक्तव्य में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानव दर्शन’ के केंद्र में एआई की महत्ता और प्रासंगिकता पर बात करते हुए कहा कि एआई केवल एक आयाम है जिसकी ‘डिजिटल चिति’ देशानुकूल एवं भावानुकूल संस्कारों के साथ विकसित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एल्गोरिदम के बहाव में न जाते हुए सोच समझकर हाथ में तकनीक और हृदय में संस्कार के साथ एआई का उपयोग मानवीय मूल्यों के सुदृढीकरण में करना चाहिए। प्रो. वीरेंद्र भारद्वाज ने सभी अतिथियों, आगंतुक माननीयों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि भारत एआई का सभ्यतागत विकास के साथ सांस्कृतिक सुदृढीकरण और संरक्षण के दिशा में उपयोग करने वाला सजग देश बन रहा है।
पहले दिन के सत्रों में प्रो. आनंद रंगनाथन और प्रो. जगदेश कुमार जैसे विशेषज्ञों ने भी हिस्सा लिया। यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन कल यानी 23 फरवरी को भी जारी रहेगा, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी और समापन सत्र में केंद्रीय कानून मंत्री शामिल होंगे। इस सम्मेलन की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देशभर के 800 से अधिक शिक्षाविदों और विद्वानों ने हिस्सा लिया।
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